: भोपाल प्रकाश तरुण पुष्कर आज से 10 दिनों के लिए बन्द
Sat, May 25, 2024
प्रकाश तरुण पुष्कर में तीन साइज के अलग अलग पुल हैं 12 फिट का जूनियर्स के लिए, 35 फिट का शुरुआती लोगों के लिए, 60 फिट का सभी तैराकों एवम् पेशेवरों के लिए। इस पुल का संचालन मध्य प्रदेश शासन के पीडब्ल्यूडी विभाग द्वारा किया जाता हैं।
यहां तैराकों के लिए ज्यादा संख्या में चेंजिग रूम, शॉवर, और बाथरूम की व्यवस्था है ( फिर भी सबसे बड़े पुल में किसी तैराक द्वारा गंदगी किया जाना , करने वाले की घटिया मानसिकता को दर्शाता हैं) इस पुल में लगभग 3500 सदस्यों की मेम्बर शिप हैं एवम् 11 शिफ्ट में क्लास चलती हैं।
: किशोर न्याय बोर्ड और न्याय में इतना विरोधाभाषी ?
Thu, May 23, 2024
किशोर न्याय बोर्ड राज्य के हरेक जिले में होता हैं , तीन सदस्यों से मिल कर बोर्ड बनता है, इस बोर्ड के समक्ष विधि के उल्लंघन करने वाले बालकों का प्रकरण लाया जाता हैं। बोर्ड के अध्यक्ष प्रथम वर्ग के न्यायिक मजिस्ट्रेट होते हैं एवम् दो अशासकीय सदस्य होते हैं।
यह बोर्ड एक न्यायपीठ का रूप लेगी। बोर्ड के समक्ष प्रकरण पुलिस द्वारा लाया जाता हैं
।
बोर्ड के यह दो सदस्य के आवदेन पत्रों की छाया प्रति , किसी अन्य को आर.टी.आई. से मांगने पर देना है की नही,
यह सहमति नियुक्त आवेदक को आवदेन पत्र में पहले से मांग लिया गया है ? मध्य प्रदेश शासन ने ऐसा किया हैं । (पारदर्शिता खत्म
) यह दो सदस्य चयनित होने पर अपने कार्यकाल के दौरान किसी भी राजनैतिक दल का पदाधिकारी नहीं होना चाहिए।
दो न्याय (
पहला
)
पुणे के एक रईसजादे किशोर (17) ने दोस्तों के साथ शराब पी, 48 हजार रु के बिल का भुगतान किया और फिर ढाई करोड़ रुपए की पोर्श कार को 160 की स्पीड से चला कर दो युवा इंजीनियर्स को मार डाला।
किशोर न्यायालय ने उसे दुर्घटना पर निबंध लिखने और आरटीओ ऑफिस में जा कर ट्रैफिक नियम समझने की शर्त लगा कर छोड़ दिया ।
दुसरा
दूसरी घटना उत्तराखंड की है, जहां एक 14 वर्षीय किशोर ने साथ पढ़ने वाली लड़की का नग्न वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर डाला, जिससे छूब्ध लड़की ने आत्महत्या कर ली।
5 माह से बाल संरक्षण गृह में बंद इस किशोर को किशोर न्यायालय ने जमानत नहीं दी, हाई कोर्ट ने यह कह कर निचली कोर्ट का आदेश बहाल रखा की (अपराध को देखते हुए जमानत देने से गलत संदेश जाएगा) ।
हाई कोर्ट ने कहा कि यह किशोर अनडिसिप्लिंड हैं। और इसे छोड़ना खतरनाक हो सकता है। लड़के की मां ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की, लेकिन कोर्ट ने भी जमानत से इनकार करते हुए हाई कोर्ट का आदेश सही माना ।
आखिर क्या वजह है जिस बात को तीन स्तर की कोर्ट्स खतरे के रूप में देख रही हैं
,
उसे पुणे के मामले में किशोर न्यायालय नहीं देख
सका और एक ऐसी शर्त रखी,
जो पीड़ित परिवार के साथ भद्दा मजाक हैं।
यह फैसला कई सवाल खड़े करता हैं ।
नोट,
कई किशोर न्यायालय में एक ही बालक एक साल में 4 से 5 बार आ रहे हैं केस में , किशोर न्यायालय 100/200 रूपए फाईन लगा कर छोड़ रही है , इससे बालकों का हौसला और भी बुलंद हो रहा है और वे बड़े क्राईम की ओर जा सकते है ।
: उच्चतम न्यायालय की गिरफ्तारी हिरासत पूछताछ संबंधित 11 सूत्रीय दिशा निर्देश
Wed, May 22, 2024
डी.के. बसु बनाम स्टेट बैंक ऑफ़ वेस्ट बंगाल (1197) 1 एस. सी. सी. 216
भारत का संविधान देश का मूल कानून है इसमें हर व्यक्ति को पुलिस व अन्य शासकीय अभिकरणों द्वारा दुर्व्यवहार से सुरक्षा दी गई है संविधान के अनुच्छेद 2 में जीवन के निजी स्वतंत्रता का अधिकार सुरक्षित है।
संविधान के अनुच्छेद 22 में गिरफ्तारी और हिरासत से संबंधित अधिकार सुरक्षित है। इन अधिकारों की सुरक्षा के लिए उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में जा सकते हैं।
1/ बंदी बनाने और पूछताछ का काम करने वाले पुलिस कर्मी के नाम और पद की घोषणा करने वाली पट्टी (टेप) स्पस्ट नजर आनी चाहिए।
2/गिरफ्तारी के समय एक मेमो तैयार करना जरूरी है , जिस पर गिरफ्तारी का समय व दिनांक अंकित किया जावे। इस मेमो पर कम से कम ऐसे गवाह का दस्तखत कराया जाए जो या तो उसे क्षेत्र का प्रतिष्ठित नागरिक हो या हिरासत में लिए जा रहे व्यक्ति का हितैषी मित्र अथवा परीजन हो।
3/ऐसे प्रत्येक बंदी का यह अधिकार है कि वह अपनी स्थिति की सूचना अपने मन पसंद शुभ चिंतक को (चाहे वह कहीं भी रहता हो, पुलिस के जरिए भिजवा दे) अर्थात बंदी बनाने के समय तैयार किए गए मेमो में गवाह के अलावा किसी एक शुभचिंतक को बंदी व्यक्ति सूचना देना चाहे तो ऐसा कर सकता हैं।
4/पुलिस द्वारा पकड़ा गया व्यक्ति जिस शुभचिंतक को सूचना देना चाहे वह अगर किसी दुरस्त नगर या जिले में हो उस व्यक्ति की गिरफ्तारी के समय और उसे रखे जानें के जगह की सूचना जिले के विधिक सहायता संगठन और संबंधित क्षेत्र के पुलिस स्टेशन के जरिए, गिरफ्तारी के 8 से 12 घंटे के अंदर, तार से देना (पुलिस के जरिए) देना जरुरी है।
5/बंदी बनाए गए व्यक्ति को उसके अधिकार का आवश्यक रूप से ज्ञान कराया जाना जरूरी है, कि वह अपने शुभचिंतक को (क्रमांक 3 व 4 के अनुसार) सूचना पहुंचा सकता हैं।
6/बंदी रखे जाने के स्थान पर केस डायरी में यह दर्ज करना जरूरी है की बंदी द्वारा बताए गए व्यक्ति किस व्यक्ति को उसकी सूचना दी गई और बंदी को किन पुलिस अफसरों की कस्टडी में रखा गया है।
7/अगर व्यक्ति आग्रह करें तो गिरफ्तारी के समय उसका शारीरिक परीक्षण कराया जाना चाहिए, उसे समय यदि उसके शरीर पर कोई छोटा या बड़े चोट के निशान हो तो उसका विवरण दर्ज करना जरूरी है ऐसे निरीक्षण प्रपत्रों (इंस्पेक्शन मेमो) पर पुलिस अधिकारी के साथ बन्दी व्यक्ति का भी हस्ताक्षर जरूरी है और उसकी प्रतिलिपि बंदी को भी दी जाए।
8/पुलिस कस्टडी में रखे गए बंदी को प्रत्येक 48 घंटे में एक बार ऐसे प्राधिकृत डॉक्टरी जांच के लिए प्रस्तुत करना जरूरी है जिसकी स्थापना प्रदेश के स्वास्थ लोक सेवा संचालक द्वारा तदाश्य के संदर्भ में की गई है ।
9/गिरफ्तारी के मेमो सहित सभी संबंधित प्रपत्रों की प्रतिलिपियां इलाके के दंडाधिकारी के पास (इसके रिकॉर्ड के लिए) भेजी जानी चाहिए ।
10/पूछताछ के दौरान बंदी व्यक्ति को अपने वकील से मिलने की अनुमति देना जरूरी है, हालांकि समुचि पूछताछ के दौरान वकील को बैठाए जाने की अनुमति से इसका आशय नहीं है ।
11/ पुलिस के समस्त जिला व प्रदेश मुख्यालय में एक ऐसा पुलिस कंट्रोल रूम होना वांछित है, जहां प्रत्येक गिरफ्तारी की सूचना में रखे जानें के स्थान की जानकारी 12 घंटे के अंदर एक ऐसे नोटिस बोर्ड पर अंकित की जाए, जिसे कोई भी आसानी से व स्पष्ट रूप से देख सके।
उक्त निर्देश प्रत्येक थाने में स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होना अनिवार्य है। इन निर्देशों का पालन न करने पर संबंधित अधिकारी पर विभागीय कार्यवाही होगी । इनका पालन न करना उच्चतम न्यायालय की अवमानना होगी, जो की एक गंभीर अपराध है जिसके लिए कैद और जुर्माना हो सकता हैं। शिकायत करने वाले व्यक्ति अवमानना की अर्जी अपने राज्य के उच्च न्यायालय (हाई कोर्ट) में दे सकते है ।
ऊपर दी गई बातें गिरफ्तार व्यक्ति के अन्य अधिकारों के साथ-साथ होनी चाहिए,
जैसे :
१, गिरफ्तारी के समय अपराध बताना जरूरी होगा। २, गिरफ्तारी के समय जोर जबरदस्ती की मनाही है। ३, गिरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के आगे पेश करना जरुरी है। ४, हिरासत में किसी भी बुरे सुलूक की मनाही है। ५, हिरासत में जुर्म कबूल करने के लिए दिया गया बयान अमान्य हैं। ६, महिला और 15 वर्ष से कम उम्र के बालक को केवल पूछताछ के लिए थाने में नहीं ले जाया जा सकता है। हिरासत में हिंसा, जिसमें मृत्यु भी शामिल है, कानून के शासन को गहरा आघात पहुंचा सकती है ।