जो अपने देश के सम्मान के लिए मरना चाहता है।” : 63 दिन का अनशन: क्रांतिकारी यतींद्र नाथ दास की शहादत, जिसे इतिहास अक्सर भूल जाता है
Ashwani Kumar Sinha
Tue, Jan 20, 2026
63 दिन का अनशन: क्रांतिकारी यतींद्र नाथ दास की शहादत, जिसे इतिहास अक्सर भूल जाता है
लाहौर, 13 सितंबर 1929।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अनेक बलिदान दर्ज हैं, लेकिन कुछ शहादतें ऐसी हैं जिन्हें समय के साथ भुला दिया गया। ऐसी ही एक अमर शहादत है क्रांतिकारी यतींद्र नाथ दास (जतिन दा) की, जिन्होंने 63 दिनों के निरंतर अनशन के बाद लाहौर जेल में प्राण त्याग दिए।
यतींद्र नाथ दास, जिनकी आयु उस समय मात्र 25 वर्ष थी, हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के सक्रिय सदस्य थे और भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त जैसे क्रांतिकारियों के निकट सहयोगी थे। दिल्ली असेंबली बम कांड के बाद जब भगत सिंह और अन्य क्रांतिकारी जेल में बंद थे, तब जतिन दा ने भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार के विरोध में भूख हड़ताल प्रारंभ की।
उनकी प्रमुख मांगें थीं—
राजनीतिक कैदियों को सामान्य अपराधियों से अलग दर्जा
सम्मानजनक भोजन और स्वच्छता
भारतीय कैदियों के साथ नस्लीय भेदभाव का अंत
ब्रिटिश सरकार को विश्वास था कि भूख जतिन दा के संकल्प को तोड़ देगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जैसे-जैसे दिन बीतते गए, उनका शरीर कमजोर होता गया। चिकित्सा अभिलेखों और इतिहासकारों के अनुसार, उनकी हालत अत्यंत गंभीर हो जाने पर जेल प्रशासन ने जबरन नाक के माध्यम से तरल भोजन देने का प्रयास किया, जो एक अमानवीय प्रक्रिया थी। इस दौरान उनकी स्थिति और बिगड़ गई।
13 सितंबर 1929 को, 63 दिनों के कठोर अनशन के बाद, यतींद्र नाथ दास ने लाहौर जेल में अंतिम सांस ली। उन्होंने अनशन नहीं तोड़ा, न ही किसी प्रकार की माफी मांगी।
उनकी शहादत की खबर पूरे देश में फैल गई। जब उनका पार्थिव शरीर लाहौर से कलकत्ता (कोलकाता) लाया गया, तो रास्ते में हर स्टेशन पर जनसमूह श्रद्धांजलि देने उमड़ पड़ा। ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, कोलकाता में उनकी अंतिम यात्रा में लाखों लोग शामिल हुए, और नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने स्वयं उनके पार्थिव शरीर को कंधा दिया।
इतिहासकार बताते हैं कि यतींद्र नाथ दास ने अपने अंतिम दिनों में कहा था—
“मैं कोई साधु नहीं हूँ। मैं एक साधारण मनुष्य हूँ, जो अपने देश के सम्मान के लिए मरना चाहता है।”
आज स्वतंत्र भारत में अक्सर हम भगत सिंह की फांसी को याद करते हैं, लेकिन उस साथी को भूल जाते हैं जिसने जेल की सलाखों के पीछे 63 दिनों तक भूखे रहकर अन्याय के विरुद्ध संघर्ष किया और अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
भारत की आज़ादी केवल आंदोलनों और प्रस्तावों से नहीं मिली, बल्कि उसकी नींव में यतींद्र नाथ दास जैसे असंख्य युवाओं का त्याग और बलिदान शामिल है।
उनकी शहादत भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक अमिट अध्याय है, जिसे स्मरण रखना हर भारतीय का नैतिक कर्तव्य है।
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