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सोचना होगा कि क्या हम उन्हें सही संस्कार भी दे पा रहे हैं? : संस्कारों से बड़ा कोई ज्ञान नहीं: 30 करोड़ की संपत्ति थी, लेकिन दो रोटियों के लिए तरस गए मां-बाप

Ashwani Kumar Sinha

Thu, Apr 10, 2025


संस्कारों से बड़ा कोई ज्ञान नहीं: 30 करोड़ की संपत्ति थी, लेकिन दो रोटियों के लिए तरस गए मां-बाप

चरखी दादरी (हरियाणा), 10 अप्रैल 2025
जब भी हम "सफलता" की बात करते हैं, तो अक्सर हम पद, संपत्ति और सामाजिक प्रतिष्ठा को ही मानक मान लेते हैं। लेकिन अगर उस सफलता के पीछे अपने ही माता-पिता के आंसू हों, तो क्या वह वास्तव में सफलता कहलाएगी?

चरखी दादरी जिले के बाढड़ा क्षेत्र के गांव गोपी में हाल ही में घटी एक दर्दनाक घटना ने पूरे समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया है। 30 करोड़ की संपत्ति होने के बावजूद, एक बुजुर्ग दंपती—78 वर्षीय जगदीशचंद और 77 वर्षीय भागली देवी—को अपने ही बेटों और बहुओं के हाथों उपेक्षा का शिकार होना पड़ा, और अंत में उन्होंने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली।

उन्होंने अपने अंतिम शब्दों में जो कहा, वो हम सभी को आत्मचिंतन करने के लिए मजबूर करता है:
"इतने जुल्म किसी संतान को अपने मां-बाप पर नहीं करने चाहिए।"

इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि डिग्री, नौकरी, और संपत्ति से बड़ा कोई मूल्य है, तो वह है – इंसानियत, संवेदनशीलता और परिवार के प्रति सम्मान।

आज जब हम अपने बच्चों को आधुनिक शिक्षा दे रहे हैं, तब हमें यह भी सोचना होगा कि क्या हम उन्हें सही संस्कार भी दे पा रहे हैं? क्या हमने उन्हें यह सिखाया कि बुजुर्गों की सेवा केवल कर्तव्य नहीं, एक सौभाग्य है?


समाज को चाहिए एक नई शिक्षा क्रांति – "संस्कार पहले, डिग्री बाद में"

समाज को अब एक नई दिशा में बढ़ना होगा, जहां शिक्षा केवल करियर नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण का माध्यम बने।

शिक्षा संस्थानों में मानव मूल्य आधारित शिक्षा, बुजुर्गों का सम्मान, और संवेदनशीलता की शिक्षा को प्राथमिकता दी जाए। माता-पिता, शिक्षक और समाज मिलकर इस दिशा में पहल करें तो हम एक संवेदनशील और आत्मनिर्भर भारत बना सकते हैं, जहां कोई मां-बाप उपेक्षित न हों।


अंत में…

इस हृदयविदारक घटना को केवल एक "समाचार" न बनाएं, इसे एक आंदोलन का बीज बनाएं—जिससे आने वाली पीढ़ियाँ सीखें कि संस्कारों से ही समाज टिकता है। संपत्ति से नहीं, प्यार से ही घर बनते हैं।

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