अदालतों में हिंदी का सीमित उपयोग क्यों? : भारत की राजभाषा हिंदी, लेकिन न्यायपालिका में नहीं पूरी तरह मान्य
Ashwani Kumar Sinha
Thu, Apr 3, 2025
भारत की राजभाषा हिंदी, लेकिन न्यायपालिका में नहीं पूरी तरह मान्य
नई दिल्ली, 03 अप्रैल 2025: भारत की राजभाषा हिंदी है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 343(1) के तहत देवनागरी लिपि में राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। हालांकि, न्यायपालिका में हिंदी का पूर्ण रूप से उपयोग नहीं किया जाता है, क्योंकि अदालतों में अंग्रेजी प्रमुख भाषा बनी हुई है।
संविधान में राजभाषा का प्रावधान
भारत में संविधान के अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा से जुड़े प्रावधान दिए गए हैं। संविधान के अनुसार, केंद्र सरकार के कामकाज के लिए हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाएं मान्य हैं। लेकिन न्यायिक प्रक्रिया में अंग्रेजी का वर्चस्व बना हुआ है।
अदालतों में हिंदी का सीमित उपयोग क्यों?
अनुच्छेद 348(1): उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में कार्यवाही अंग्रेजी में ही संचालित होती है।
कानूनी दस्तावेजों की जटिलता: अधिकतर कानूनी ग्रंथ, अधिनियम, संविधान और न्यायिक मिसालें अंग्रेजी में उपलब्ध हैं, जिससे हिंदी में अनुवाद की प्रक्रिया जटिल हो जाती है।
वकीलों और न्यायाधीशों की अंग्रेजी पर निर्भरता: न्यायिक प्रक्रिया और तर्क-वितर्क आमतौर पर अंग्रेजी में होते हैं, जिससे हिंदी को अपनाने में कठिनाई आती है।
कुछ राज्यों में हिंदी की स्वीकृति
हालांकि, कुछ राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार में उच्च न्यायालयों में हिंदी के उपयोग की अनुमति दी गई है। अनुच्छेद 348(2) के तहत, राज्य सरकारें राष्ट्रपति की अनुमति से अपने उच्च न्यायालयों में हिंदी को न्यायिक कार्यवाही की भाषा बना सकती हैं।
भविष्य की संभावनाएं
भारत सरकार हिंदी को न्यायपालिका में अधिक प्रभावी बनाने के लिए प्रयासरत है। कई बार संसद और विधि आयोग ने उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में हिंदी के उपयोग को बढ़ावा देने की सिफारिश की है।
हाल ही में मुख्य न्यायाधीश और कानून मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद की प्रक्रिया तेज करने पर सहमति जताई है।
निष्कर्ष
भले ही हिंदी भारत की राजभाषा है, लेकिन न्यायिक व्यवस्था में अंग्रेजी का प्रभाव अभी भी अधिक है। हिंदी को न्यायपालिका में पूरी तरह से लागू करने के लिए कानूनी दस्तावेजों का अनुवाद, न्यायाधीशों और वकीलों की हिंदी में दक्षता और एक सुचारु भाषा नीति की आवश्यकता होगी।
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