: अधिवक्ता अधिनियम | बीसीआई द्वारा अपील पर सुनवाई से पहले राज्य बार काउंसिल की अनुशासनात्मक जांच पूरी होनी चाहिए: पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय
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Sat, Mar 8, 2025
अधिवक्ता अधिनियम | बीसीआई द्वारा अपील पर सुनवाई से पहले राज्य बार काउंसिल की अनुशासनात्मक जांच पूरी होनी चाहिए: पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय
08-03-2025
हाल ही में एक ऐतिहासिक फैसले में, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) राज्य बार काउंसिल की अनुशासन समिति द्वारा पारित अंतरिम आदेश के खिलाफ अपील पर विचार नहीं कर सकती है, जब जांच अभी भी जारी है और कोई अंतिम सजा नहीं दी गई है। यह फैसला राज्य बार काउंसिल द्वारा अपनी जांच पूरी करने और अंतिम आदेश जारी करने से पहले अनुशासनात्मक मामलों के संबंध में बार काउंसिल ऑफ इंडिया की प्रक्रियात्मक सीमाओं को स्पष्ट करता है।
मामले का विवरण:
यह मामला जिला बार एसोसिएशन (डीबीए) , करनाल के अध्यक्ष संदीप चौधरी के खिलाफ दायर एक शिकायत से शुरू हुआ । शिकायत में आरोप लगाया गया था कि चौधरी एसोसिएशन के फंड के गबन में शामिल थे और अयोग्य वकीलों को चैंबर आवंटित कर रहे थे । जवाब में, मामले की जांच के लिए एक विशेष समिति गठित की गई थी। विशेष समिति ने आरोपों को सही पाया और एक अंतरिम आदेश पारित किया, जिसमें कहा गया कि चौधरी को चैंबर निर्माण के मामले से दूर रखा जाना चाहिए और उन्हें अगले तीन वर्षों तक किसी भी डीबीए चुनाव लड़ने से रोक दिया जाना चाहिए ।
हालाँकि, संदीप चौधरी ने इस आदेश को बार काउंसिल ऑफ इंडिया की अनुशासन समिति के समक्ष चुनौती दी , जिसने अंततः उन्हें अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ने की अनुमति दे दी।
इसके बाद मामला पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में लाया गया , जहां याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया की अनुशासन समिति के पास अपील पर विचार करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि जांच अधूरी थी और राज्य बार काउंसिल द्वारा कोई अंतिम सिफारिश या सजा नहीं दी गई थी।
न्यायालय का विश्लेषण:
न्यायमूर्ति सुरेश्वर ठाकुर और न्यायमूर्ति विकास सूरी की अध्यक्षता वाली अदालत ने अधिवक्ता अधिनियम की धारा 37 का हवाला दिया , जिसमें अपील की प्रक्रिया का उल्लेख है। अदालत ने कहा कि राज्य बार काउंसिल की अनुशासन समिति के आदेश से व्यथित कोई भी व्यक्ति 60 दिनों के भीतर बार काउंसिल ऑफ इंडिया में अपील कर सकता है, बशर्ते कि राज्य बार काउंसिल अपनी जांच पूरी कर ले, अपना अंतिम आदेश पारित कर दे और सजा सुना दे।
न्यायाधीशों ने पाया कि विशेष समिति ने अभी तक आरोपों की जांच पूरी नहीं की है। इसके अलावा, पंजाब और हरियाणा बार काउंसिल की अनुशासन समिति को कोई अंतिम सिफारिशें नहीं की गई थीं और प्रतिवादी पर कोई दंड नहीं लगाया गया था। इसलिए, बार काउंसिल ऑफ इंडिया के लिए अपील पर विचार करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था ।
न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया की अनुशासन समिति द्वारा अपील तभी स्वीकार की जा सकती है जब राज्य बार काउंसिल की अनुशासन समिति अनुशासनात्मक कार्यवाही पूरी कर ले और अंतिम आदेश दे दे। चूंकि ऐसा नहीं हुआ था, इसलिए इस मामले में बार काउंसिल ऑफ इंडिया की भागीदारी को अमान्य और गैर-अस्तित्व (अस्तित्व में नहीं) माना गया।
निर्णय:
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया की अनुशासन समिति द्वारा पारित अंतरिम आदेश अनुचित तरीके से गठित अपील पर बनाया गया था और वैध नहीं था। अपील पर विचार नहीं किया जा सका क्योंकि राज्य बार काउंसिल द्वारा आवश्यक कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया था । परिणामस्वरूप, उच्च न्यायालय ने याचिका को स्वीकार कर लिया, बार काउंसिल ऑफ इंडिया के आदेश को रद्द कर दिया और अपील से संबंधित किसी भी आगे की कार्यवाही को अलग रखा।
याचिकाकर्ता बनाम प्रतिवादी: जगमाल सिंह जटैन बनाम अनुशासन समिति, बार काउंसिल ऑफ इंडिया
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