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: रोगों के निदान में आयुर्वेद का दिशा निर्देशन

Admin

Thu, May 2, 2024
*रोगों के निदान में आयुर्वेद का दिशा-निर्देशन* रोग के जड़ से निदान के लिए सम्पूर्ण उपाय किया जाना चाहिए, जिस प्रकार काटा हुआ वृक्ष फिर से हरा हो जाता है उस प्रकार यदि रोग को समूल नष्ट न किया जाए तो वह फिर से बढ़ जाता है। जैसे अनुकूल ऋतु व जल उपलब्ध होने पर जड़ से पुनः शाख व पत्ते फूट आते है । उसी प्रकार यदि रोग को दबा दिया जाए और रोग को कारण सहित समूल नष्ट न किया जाए तो अपने अनुकूल दूषित आहार-विहार और अपथ्य का संयोग होने पर ऐसा रोग फिर से पनप कर शरीर को ग्रस्त कर लेता है । बुद्धिमान को चाहिए कि रोग के लक्षण देखते ही जो भी उचित उपाय हो उसे शीघ्र कर रोग को समूल नष्ट करने का प्रयत्न करें, रोग पैदा करने व बढ़ाने वाला खान- पान और रहन- सहन त्याग दे। जैसे मूर्ख व्यक्ति अपने शत्रु को नही पहचान पाता और धोखा खा जाता है उसी प्रकार मूर्ख व्यक्ति अज्ञानता, आलस्य और लापरवाही के कारण अपने शरीर में उत्पन्न हुए रोग को पहचान नही पाता लिहाज़ा अनजाने ही रोग का शिकार हो जाता है ।

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