"एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान – नहीं चलेंगे!" : भारत मां के सच्चे सपूत: डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी – एक विचारधारा, एक प्रेरणा"
Ashwani Kumar Sinha
Mon, Jun 23, 2025
📰 "भारत मां के सच्चे सपूत: डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी – एक विचारधारा, एक प्रेरणा"
📅 23 जून 2025 | पुण्यतिथि विशेष
"एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान – नहीं चलेंगे!"
यह उद्घोष उस महामानव की आवाज़ थी, जिसने न केवल एक राजनीतिक संगठन की नींव रखी, बल्कि देश की एकता, अखंडता और राष्ट्रवाद को जीवन का परम ध्येय मानते हुए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया।
आज, 23 जून को हम भारतीय जनसंघ के संस्थापक और पहले अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि पर उन्हें कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
🔷 संक्षिप्त जीवन परिचय:
जन्म: 6 जुलाई 1901, कोलकाता
पिता: सर आशुतोष मुखर्जी – प्रख्यात शिक्षाविद एवं न्यायविद
शिक्षा: B.A. (ऑनर्स) प्रथम श्रेणी, LLB, Barrister-at-Law (लंदन), Ph.D. (कलकत्ता विश्वविद्यालय)
🏛️ शिक्षा से राजनीति तक का सफर:
मात्र 33 वर्ष की उम्र में कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने – आज तक सबसे युवा कुलपति का रिकॉर्ड।
1939 में कांग्रेस से मतभेद के बाद हिंदू महासभा से जुड़े, 1944 में उसके अध्यक्ष बने।
भारत विभाजन का उन्होंने प्रखर विरोध किया, और बंगाल को पाकिस्तान में जाने से बचाने में निर्णायक भूमिका निभाई।
🧭 जनसंघ की स्थापना – विचार से संगठन तक:
1951 में "भारतीय जनसंघ" की स्थापना की – जो आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के रूप में विकसित हुआ।
उनका लक्ष्य: भारत की एकता, सांस्कृतिक गौरव और राष्ट्र-स्वाभिमान।
🇮🇳 "कश्मीर" पर बलिदान – एक जीवित प्रतीक:
1953 में अनुच्छेद 370 के विरोध में बिना परमिट जम्मू-कश्मीर गए।
गिरफ्तारी हुई और 23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी जेल में मृत्यु हो गई।
आज भी यह बलिदान भारत की एकता की अनमोल नींव है।
🌾 प्रेरणा के स्तंभ – क्यों याद करें मुखर्जी को?
राष्ट्रवाद की वैचारिक रीढ़
त्याग, तर्क और तपस्या का अद्भुत समन्वय
कश्मीर, शिक्षा, संस्कृति, राजनीति – हर क्षेत्र में योगदान
दलीय नहीं, देशप्रेम से प्रेरित जीवन
📜 कुछ प्रेरणादायक उद्धरण:
🗣️ "भारत की सांस्कृतिक आत्मा को मिटाने का कोई प्रयास सफल नहीं होगा।"
🗣️ "राष्ट्रीय एकता केवल नारा नहीं, जीवन पद्धति होनी चाहिए।"
🔔 आज की पीढ़ी के लिए संदेश:
डॉ. मुखर्जी की जीवनगाथा हमें सिखाती है कि विचारधारा के लिए संघर्ष हो, तो तर्क के साथ तपस्या अनिवार्य है। जब कोई नेता अपना जीवन देश की मिट्टी की रक्षा में न्योछावर करता है, तब वह केवल नेता नहीं – राष्ट्र-ऋषि बन जाता है।
🙏 श्रद्धांजलि:
आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें केवल स्मरण न करें, बल्कि उनके दिखाए मार्ग को विचार और व्यवहार में अपनाएं।
भारत की धरती पर ऐसे महापुरुष होते रहे हैं, और यह धरती ऐसे सपूतों को जन्म देती रहेगी।
✍️ – विशेष प्रतिनिधि, भारत विचार संवाद सेवा
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