: सुप्रीम कोर्ट का फैसला : तलाक के मुख्य आधार कर दिए तय, सुलह नहीं तो तलाक होगा मंजूर, नहीं करना होगा 6 माह का इंतजार
Admin
Mon, Dec 9, 2024
सुप्रीम कोर्ट का फैसला :तलाक के मुख्य आधार कर दिए तय,
सुलह नहीं तो तलाक होगा मंजूर, नहीं करना होगा 6 माह का इंतजार
सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने सोमवार को तलाक को लेकर अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि अगर पति-पत्नी के रिश्ते टूट चुके हों और सुलह की गुंजाइश ही नहीं बची हो तो वे भारत के संविधान के आर्टिकल- 142 के तहत बिना फैमिली कोर्ट भेजे तलाक को मंजूरी दे सकता है। इसके लिए 6 महीने का इंतजार अनिवार्य नहीं होगा। कोर्ट ने कहा कि उसने वे फैक्टर्स तय किए हैं जिनके आधार पर शादी को सुलह की संभावना से परे माना जा सकेगा। इसके साथ ही कोर्ट यह भी सुनिश्चित करेगा कि पति-पत्नी के बीच बराबरी कैसे रहेगी? इसमें मेंटेनेंस, एलिमनी और बच्चों की कस्टडी शामिल है। यह फैसला जस्टिस एसके कौल, जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस एएस ओका और जस्टिस जेके माहेश्वरी की संविधान पीठ ने सुनाया।
संविधान पीठ को ये मामला क्यों भेजा
गया था: इस मुद्दे को एक संविधान पीठ को यह विचार करने के लिए भेजा गया था कि क्या हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 बी के तहत आपसी सहमति से तलाक को प्रतीक्षा अवधि (वेटिंग पीरियड) को माफ किया जा सकता है। हालांकि खंडपीठ ने यह भी विचार करने का फैसला किया कि क्या
सुप्रीम कोर्ट ने पति और पत्नी में सुलह की संभावना से परे रहने वाले मानक तय किए।
शादी के सुलह की गुंजाइश ही नहीं बची हो तो विवाह को खत्म किया जा सकता है। आपको बता दें कि यह मामला डिवीजन बेंच ने 29 जून 2016 को पांच जजों की संविधान पीठ को रेफर किया था। पांच याचिकाओं पर लंबी सुनवाई के बाद बेंच ने 20 सितंबर, 2022 को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। अदालत ने कहा था कि सामाजिक परिवर्तन में थोड़ा समय लगता है और कभी-कभी कानून लाना आसान होता है, लेकिन समाज को इसके साथ बदलने के लिए राजी करना मुश्किल होता है। इसके चलते संविधान पीठ के फैसले को भी महीनों तक रोक लिया गया।
सितंबर 2022 में हुई थी सुनवाई : इंदिरा जयसिंह, कपिल सिब्बल, वी. गिरी, दुष्यंत दवे और मीनाक्षी अरोड़ा जैसे सीनियर एडवोकेट्स को मामले में न्याय मित्र बनाया गया। इंदिरा ने कहा था कि शादी के रिश्तों को संविधान के आर्टिकल 142 के तहत खत्म किया जाना चाहिए। दवे ने इसके विरोध में तर्क देकर कहा कि संसद ने ऐसे मामलों को तलाक का आधार नहीं माना है तो कोर्ट को भी अनुमति नहीं देनी चाहिए। गिरी ने कहा कि टूट चुकी शादियों को क्रूरता का आधार माना जा सकता है। कोर्ट इसमें मानसिक क्रूरता को भी शामिल करे।
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