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अधिवक्ताओं को निश्चित या पूर्व-निर्धारित फीस ही लेनी चाहिए। : एडवोकेट फीस पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा निर्देश : प्रतिशत पर फीस तय करना गैर-कानूनी

Ashwani Kumar Sinha

Sun, Aug 24, 2025

एडवोकेट फीस पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा निर्देश : प्रतिशत पर फीस तय करना गैर-कानूनी

नई दिल्ली।
क्लेम केसों में अधिवक्ता और मुवक्किल के बीच फीस को लेकर विवाद आम है। हाल ही में एक मामला प्रकाश में आया जिसमें मुवक्किल ने अपने अधिवक्ता को क्लेम केस की पैरवी हेतु 10% फीस तय कर ₹1,00,000 का चेक दिया। केस का निर्णय आने के बाद जब अधिवक्ता ने फीस की चेक को प्रस्तुत किया तो वह अनादृत हो गया। अधिवक्ता ने इसकी वसूली हेतु धारा 138, Negotiable Instruments Act के तहत कार्यवाही की तैयारी की।

लेकिन विधिक विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि—

👉 सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्देश है कि अधिवक्ता अपनी फीस का निर्धारण प्रतिशत (contingency fee या success fee) पर नहीं कर सकते।
👉 ऐसा समझौता भारतीय विधि के तहत “against public policy” (लोकनीति के विरुद्ध) माना जाता है।
👉 अधिवक्ता और मुवक्किल के बीच केवल निश्चित फीस (fixed fee) या कार्य के आधार पर मानदेय (professional fee) निर्धारित किया जा सकता है।

⚖ विधिक स्थिति :

  1. Advocates Act, 1961 एवं Bar Council of India Rules के अनुसार –

    • वकालत एक “noble profession” है, व्यापार नहीं।

    • फीस को “contingency / percentage” से जोड़ना प्रतिबंधित है।

  2. सुप्रीम कोर्ट का प्रमुख निर्णय :

    • B. Sunitha vs State of Telangana & Anr.
      (2018) 1 SCC 638

    • इस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि —

      “Contingency fee arrangements, by which a lawyer is paid a percentage of the decretal amount, are prohibited. Such contracts are against public policy and unenforceable.”

  3. धारा 138 N.I. Act (चेक बाउंस केस) –

    • यह तभी लागू होता है जब चेक किसी वैध debt or liability के बदले जारी किया गया हो।

    • यदि फीस अनुबंध ही ग़ैर-कानूनी (illegal contract) है तो चेक वैध देयता नहीं माना जाएगा।

    • इसलिए धारा 138 का मामला अधिवक्ता के पक्ष में सफल नहीं होगा।

📰 निष्कर्ष :

  • मुवक्किल और अधिवक्ता के बीच प्रतिशत पर तय फीस अवैध है।

  • ऐसा समझौता कोर्ट में टिकता नहीं और चेक बाउंस केस (138 N.I. Act) भी इस आधार पर खारिज हो सकता है।

  • सुप्रीम कोर्ट का निर्णय (B. Sunitha vs State of Telangana, (2018) 1 SCC 638) इस विषय पर अंतिम मार्गदर्शक है।

  • विशेषज्ञों की राय है कि अधिवक्ताओं को निश्चित या पूर्व-निर्धारित फीस ही लेनी चाहिए।


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