संघ और शिव के भाव में अद्भुत समानता — पंडित प्रदीप मिश्रा : भारतीय समाज का स्वभाव है सामाजिक सद्भाव — सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत
Ashwani Kumar Sinha
Sat, Jan 3, 2026
भारतीय समाज का स्वभाव है सामाजिक सद्भाव
— सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत
संघ और शिव के भाव में अद्भुत समानता
— पंडित प्रदीप मिश्रा
भोपाल। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से कुशाभाऊ ठाकरे सभागार में आयोजित सामाजिक सद्भाव बैठक में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि सामाजिक सद्भाव कोई नई अवधारणा नहीं, बल्कि भारतीय समाज का स्वाभाविक संस्कार है। समाज में सज्जन शक्ति का जागरण, आचरण में पंच परिवर्तन और निरंतर संवाद आज की आवश्यकता है। बैठक में मध्यभारत प्रान्त के 16 शासकीय जिलों से विभिन्न समाजों और संगठनों के प्रतिनिधियों ने सहभागिता की।
डॉ. भागवत ने कहा कि समाज का अर्थ है—समान गंतव्य की ओर बढ़ने वाला समूह। भारतीय संस्कृति सदैव भौतिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से सुखी जीवन की कल्पना करती रही है। विविधता के बावजूद एकता ही हमारी पहचान है। हिंदू कोई संज्ञा नहीं, बल्कि ऐसा स्वभाव है जो मत, पंथ और पूजा-पद्धति के आधार पर संघर्ष नहीं करता। उन्होंने कहा कि समाज को जोड़कर रखने का कार्य कानून नहीं, बल्कि सद्भावना करती है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि समाज को विभाजित करने के प्रयास भ्रम फैलाकर किए गए हैं, जबकि सच्चाई यह है कि भारत में रहने वाले सभी लोगों की सांस्कृतिक जड़ें एक हैं। सद्भावना केवल संकट में नहीं, बल्कि निरंतर संवाद, सहयोग और सहभागिता से बनी रहती है। समर्थ को दुर्बल की सहायता करनी चाहिए—यही सामाजिक धर्म है।
पहले सत्र में प्रख्यात कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा ने कहा कि संघ और भगवान शिव के भाव में समानता है। जैसे शिव ने सृष्टि के लिए विष पिया, वैसे ही संघ निरंतर आरोपों और विरोध के बीच संयम और राष्ट्रहित में कार्य करता है। उन्होंने कहा कि जन्म किसी भी जाति में हो, पहचान अंततः हिंदू, सनातनी और भारतीय की ही होती है। धर्मांतरण को उन्होंने आने वाली पीढ़ियों के लिए गंभीर चुनौती बताते हुए समाज को सजग रहने का आह्वान किया।
कार्यक्रम में विभिन्न समाजों के प्रतिनिधियों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण, सेवा कार्य, महिला सशक्तिकरण, सामूहिक विवाह, रोजगार और सांस्कृतिक संरक्षण से जुड़े अपने-अपने कार्यों का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया, जो सामाजिक सद्भाव का जीवंत उदाहरण रहा।
बैठक का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि समाज अपनी समस्याओं के समाधान हेतु स्वयं आगे आएगा और एक समाज, एक राष्ट्र की भावना के साथ सामूहिक प्रयास करेगा।
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