राजनीति सत्ता पाने का साधन नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण का महान तप : दीनदयाल उपाध्याय जयंती : सादगी और त्याग से गढ़ा राष्ट्रवाद का मजबूत आधार
Ashwani Kumar Sinha
Thu, Sep 25, 2025
दीनदयाल उपाध्याय जयंती : सादगी और त्याग से गढ़ा राष्ट्रवाद का मजबूत आधार
लखनऊ। भारतीय जनसंघ (वर्तमान भाजपा) के निर्माता और प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जीवन सादगी, त्याग और समर्पण का प्रतीक रहा। आज उनके जन्मदिवस पर देश उन्हें श्रद्धा और कृतज्ञता के साथ नमन कर रहा है।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय आरएसएस में उत्तर प्रदेश के प्रान्त प्रचारक रहे। द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरुजी) ने जब उन्हें जनसंघ का कार्यभार संभालने का आग्रह किया तो दीनदयाल जी ने सहज ही कहा— “गुरुजी, मैं राजनीतिक जीवन नहीं जी सकता, मेरी वृत्ति राजनीति के अनुकूल नहीं है।” इस पर गुरुजी का उत्तर था— “दीनदयाल, जिस दिन तुम्हें राजनीति अच्छी लगने लगेगी, उसी दिन तुम्हें मैं वापस बुला लूँगा।” यही वह क्षण था जब दीनदयाल जी ने जीवन का पूरा मार्ग बदल दिया और दो जोड़ी धोती-कुर्ते के साथ राष्ट्रवादी राजनीति की नींव रखने निकल पड़े।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में कांग्रेस और मुस्लिम लीग की नीतियों का विरोध करते हुए भारतीय जनसंघ का गठन हुआ, जिसमें दीनदयाल उपाध्याय ने अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा और जीवन होम दिया। वे सादगी और आत्मबल के प्रतीक थे—फटी धोती में, पैदल या साइकिल से यात्रा करते, साधारण भोजन करते हुए भी उन्होंने कांग्रेस, वामपंथ और विभाजनकारी ताकतों से डटकर संघर्ष किया।
आज जिस भारतीय जनता पार्टी का विशाल स्वरूप देश की राजनीति में खड़ा है, उसकी नींव में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का तप, त्याग और विचारधारा की दृढ़ता शामिल है। उनका ‘एकात्म मानववाद’ आज भी भारतीय राजनीति के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत बना हुआ है।
दीनदयाल जी ने न केवल संगठन को खड़ा किया बल्कि यह भी दिखाया कि राजनीति सत्ता पाने का साधन नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण का महान तप है। सचमुच, वे अपनी हड्डियां तक गलाकर राष्ट्रवाद के मंदिर की नींव का पत्थर बन गए।
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