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राष्ट्र प्रथम — स्वदेशी सर्वोपरि” के उनके संदेश को जन-जन तक पहुँचाने : दत्तोपंत ठेंगड़ी जी की पुण्यतिथि : राष्ट्र निर्माण, श्रम साधना और स्वदेशी चिंतन के अमर प्रहरी

Ashwani Kumar Sinha

Tue, Oct 14, 2025


दत्तोपंत ठेंगड़ी जी की पुण्यतिथि : राष्ट्र निर्माण, श्रम साधना और स्वदेशी चिंतन के अमर प्रहरी

भोपाल, 14 अक्टूबर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रखर विचारक, समाजसेवी और श्रमिक-किसान आंदोलन के महान संगठनकर्ता पंडित दत्तात्रेय बापूराव ठेंगड़ी (दत्तोपंत ठेंगड़ी) जी की पुण्यतिथि आज पूरे देश में श्रद्धा और आदर के साथ मनाई गई। संघ परिवार से जुड़े विविध संगठनों, सामाजिक संस्थाओं एवं विचार मंचों ने उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए उनके जीवन से प्रेरणा लेने का संकल्प लिया।

ठेंगड़ी जी का जन्म 10 नवंबर 1920 को महाराष्ट्र के वर्धा जिले के अर्वी नगर में हुआ था। उन्होंने मॉरिस कॉलेज नागपुर से स्नातकोत्तर और लॉ कॉलेज नागपुर से एल.एल.बी. की शिक्षा प्राप्त की। युवावस्था में ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बने और जीवनभर राष्ट्रहित, श्रमिक कल्याण तथा भारतीय अर्थदर्शन को समर्पित रहे।

वे दूरदर्शी विचारक और कर्मयोगी थे, जिन्होंने भारतीय चिंतन के आधार पर “तीसरा मार्ग” (Third Way) का सिद्धांत प्रस्तुत किया — जो न पूंजीवाद था, न समाजवाद, बल्कि भारतीय संस्कृति पर आधारित स्वदेशी अर्थव्यवस्था का मार्ग था।

ठेंगड़ी जी ने संगठन जीवन में कई ऐतिहासिक संस्थाओं की स्थापना की —

  • भारतीय मजदूर संघ (BMS) – 1955

  • भारतीय किसान संघ (BKS) – 1979

  • स्वदेशी जागरण मंच – 1991
    इनके अलावा उन्होंने अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद, ग्राहक पंचायत, पर्यावरण मंच और सर्वपंथ समादर मंच जैसी अनेक सामाजिक संस्थाओं को भी दिशा दी।

वे दो बार राज्यसभा सदस्य (1964–1976) रहे। परंतु सत्ता या पुरस्कार से दूर रहते हुए उन्होंने सदैव संगठन और सिद्धांत को प्राथमिकता दी। भारत सरकार द्वारा दिए जाने वाले पद्म भूषण सम्मान को भी उन्होंने विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया।

उनकी प्रसिद्ध पुस्तकों में “Third Way”, “National Pursuit”, “What Sustains the Sangh”, “Our National Renaissance” और “Dr. Ambedkar and Social Revolution” प्रमुख हैं। इन ग्रंथों ने भारतीय आर्थिक दृष्टिकोण और राष्ट्रधर्म आधारित चिंतन को नया आयाम दिया।

14 अक्टूबर 2004 को पुणे में उनका देहावसान हुआ, किंतु उनके विचार आज भी प्रत्येक स्वयंसेवक, किसान, श्रमिक और राष्ट्रसेवक के जीवन में प्रेरणास्रोत बने हुए हैं।

भोपाल सहित देशभर में आज विभिन्न संगोष्ठियों और श्रद्धांजलि सभाओं में उनके विचारों पर चर्चा की गई और “राष्ट्र प्रथम — स्वदेशी सर्वोपरि” के उनके संदेश को जन-जन तक पहुँचाने का संकल्प लिया गया।

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