अब हमारा दायित्व है कि जोड़ने की परंपरा को नयी पीढ़ी तक पहुँचाएं : प्राचीन भारतीयों ने संस्कृति व विज्ञान का प्रचार किया, विजय या धर्मांतरण नहीं” — मोहन भागवत ने
Ashwani Kumar Sinha
Mon, Oct 20, 2025
“प्राचीन भारतीयों ने संस्कृति व विज्ञान का प्रचार किया, विजय या धर्मांतरण नहीं” — मोहन भागवत
मुंबई, 19 अक्टूबर 2025
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत ने कहा कि भारतवर्ष के प्राचीन लोगों ने विश्व के कोने-कोने तक अपनी संस्कृति, विज्ञान और ज्ञान का प्रचार किया, लेकिन कभी किसी पर विजय प्राप्त करने या किसी का धर्म परिवर्तन कराने का प्रयास नहीं किया।
वे मुंबई में आयोजित ‘आर्य युग विषय कोष विश्वकोश’ के विमोचन समारोह को संबोधित कर रहे थे।
भागवत जी ने कहा —
“हमारे पूर्वज मेक्सिको से लेकर साइबेरिया तक गए। उन्होंने वहां के समाजों को विज्ञान, ज्योतिष, दर्शन और संस्कृति की शिक्षा दी। उन्होंने न किसी पर अधिकार जमाया, न किसी को अपना धर्म अपनाने को बाध्य किया। भारतीय संस्कृति की पहचान ही सद्भावना, एकता और समरसता है।”
उन्होंने आगे कहा कि भारत पर अनेक आक्रमण हुए — कुछ ने धन लूटा, कुछ ने शासन किया —
“परन्तु सबसे गहरा आक्रमण हमारे मन और विचारों पर हुआ। हम अपनी असली शक्ति, अपने ज्ञान और अपनी विश्वहित दृष्टि को भूल गए। अब समय है कि हम अपने मन को पुनः स्वतंत्र करें।”
आध्यात्मिकता और शिक्षा पर विचार
भागवत जी ने वर्तमान शिक्षा प्रणाली पर भी चिंता व्यक्त की।
उन्होंने कहा कि तथाकथित “मैकाले शिक्षा पद्धति” ने भारतीयों को अपनी परंपरा से काट दिया है।
“हमारी शिक्षा अब हमें ज्ञानी नहीं, केवल कुशल कर्मचारी बना रही है। हमें अपनी भारतीय ज्ञान प्रणाली — वेद, उपनिषद, आयुर्वेद, योग, वास्तु, गणित और दर्शन — से पुनः जुड़ना होगा। यही हमारी पहचान है और यही भारत की आत्मा।”
उन्होंने यह भी कहा कि भारत आज भी विश्व के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शन का केंद्र है।
“हम आर्यव्रत के वंशज हैं — हमारे भीतर विज्ञान है, शक्ति है, विश्वास है और ज्ञान है। हमें केवल अपने आप पर पुनः विश्वास करना है।”
आर्य युग विषय कोष: भारतीय ज्ञान का पुनरुत्थान
‘आर्य युग विषय कोष विश्वकोश’ एक दीर्घकालिक परियोजना है जिसमें भारतीय सभ्यता की प्राचीन उपलब्धियों — विज्ञान, कला, साहित्य, दर्शन और संस्कृति — को विश्वकोशीय रूप में संग्रहीत किया जा रहा है।
इस अवसर पर भागवत जी ने कहा कि यह कार्य केवल विद्या नहीं, संस्कृति पुनर्जागरण का अभियान है।
“आर्य सभ्यता ने कभी दूसरों पर शासन का लक्ष्य नहीं रखा। उसने दुनिया को जोड़ने, साझा करने और समरसता का संदेश दिया।”
स्वयंसेवकों के लिए संदेश
भागवत जी का यह कथन प्रत्येक स्वयंसेवक के लिए एक स्मरण है कि संघ का कार्य केवल संगठन निर्माण नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति, विचार और ज्ञान परंपरा का जागरण है।
स्वयंसेवक जहाँ भी जाए, वह भारतीय जीवन मूल्यों का प्रतिनिधि बने।
हमें भारत के ‘सॉफ्ट पावर’ — यानि सद्भाव, विज्ञान, संस्कार और संयम — को समाज के प्रत्येक स्तर तक पहुँचाना है।
विजय नहीं, विवेक हमारी परंपरा है; परिवर्तन नहीं, प्रेरणा हमारा साधन है।
भागवत जी का वक्तव्य उस वैचारिक दृष्टि को सशक्त करता है जिसमें भारत को “विश्वगुरु” की भूमिका में देखा गया है — जो सत्ता या विस्तार से नहीं, बल्कि ज्ञान, अध्यात्म और मानवता के मार्ग से अग्रणी रहा है।
यह विचार आज के वैश्विक परिवेश में भी प्रासंगिक है, जहाँ संघर्ष की जगह सहयोग और प्रतिस्पर्धा की जगह सहअस्तित्व की आवश्यकता है।
डॉ. भागवत का यह संदेश केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य का आह्वान है —
“भारतीय संस्कृति ने कभी किसी को जीता नहीं, उसने सबको जोड़ा है।
अब हमारा दायित्व है कि हम इस जोड़ने की परंपरा को नयी पीढ़ी तक पहुँचाएं,
ताकि भारत पुनः विश्व में अपने ज्ञान और संस्कार से प्रकाश फैलाए।”
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