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औरंगज़ेब के वंशज' नहीं, 'भारत माता के पुत्र' बनें : आरएसएस में सभी धर्मों का स्वागत, लेकिन शर्तें ज़रूरी"

Ashwani Kumar Sinha

Mon, Apr 7, 2025


धर्म-संवाद | विशेष रिपोर्ट
वाराणसी में मोहन भागवत का बयान: "आरएसएस में सभी धर्मों का स्वागत, लेकिन शर्तें ज़रूरी"

वाराणसी | 6 अप्रैल 2025
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने वाराणसी के लाजपत नगर में आयोजित एक शाखा कार्यक्रम में बड़ा बयान देते हुए कहा कि संघ में सभी धर्मों और समुदायों के लोगों का स्वागत है, लेकिन कुछ मूल विचारों और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करना आवश्यक होगा।

भागवत ने कहा, "संघ की शाखा में आने से किसी को कोई नहीं रोकता, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का हो। लेकिन यदि आप 'भारत माता की जय' नहीं बोल सकते, या भगवा ध्वज का सम्मान नहीं कर सकते, तो फिर स्वयंसेवक कैसे बनेंगे?"

'औरंगज़ेब के वंशज' नहीं, 'भारत माता के पुत्र' बनें

अपने संबोधन में भागवत ने यह भी कहा कि जो लोग स्वयं को औरंगज़ेब का वंशज मानते हैं, वे संघ में स्थान नहीं पा सकते। उनका यह बयान धार्मिक पृष्ठभूमि से अधिक राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पहचान को लेकर था।

"हमारे लिए सबसे पहले भारत माता है। हम किसी की पूजा पद्धति नहीं पूछते, लेकिन यह अपेक्षा जरूर करते हैं कि संघ के कार्यकर्ता राष्ट्र और उसकी संस्कृति के प्रति पूरी निष्ठा रखें," उन्होंने कहा।

'संघ का दरवाजा सबके लिए खुला है'

मोहन भागवत ने यह स्पष्ट किया कि संघ किसी भी धर्म, जाति या वर्ग के खिलाफ नहीं है। बल्कि वह चाहता है कि हर भारतीय, चाहे वह किसी भी आस्था को मानता हो, एक साझा सांस्कृतिक पहचान को अपनाए।

"पंथ अनेक हो सकते हैं, पर धर्म – यानी जीवन जीने की भारतीय पद्धति – एक ही है। हम चाहते हैं कि सभी भारतवासी मिल-जुल कर इस राष्ट्र को आगे बढ़ाएं," उन्होंने कहा।

राजनीतिक और सामाजिक हलकों में हलचल

भागवत के इस बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।
समर्थक गुटों का मानना है कि यह संघ की समावेशी सोच को दर्शाता है और यह मुस्लिम, ईसाई जैसे अन्य समुदायों के लिए संघ में जुड़ने का द्वार खोलता है।

निष्कर्ष:

मोहन भागवत का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में धार्मिक समरसता और राष्ट्रवाद को लेकर नई बहसें उभर रही हैं। इस बयान ने जहां कुछ लोगों को संघ के प्रति आकर्षित किया है, वहीं कुछ वर्गों को यह सोचने पर भी मजबूर कर दिया है कि समावेशी भारत की परिभाषा आखिर क्या होनी चाहिए।

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