यह निर्णय देशभर की अदालतों के लिए एक मापदंड (precedent) स्थापित करता ह : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय: नाबालिग को उम्रकैद देने का आदेश रद्द, कहा – अपराध ‘हीनियस’ नहीं था
Ashwani Kumar Sinha
Wed, Jun 25, 2025
📰 छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय: नाबालिग को उम्रकैद देने का आदेश रद्द, कहा – अपराध ‘हीनियस’ नहीं था
बिलासपुर | दिनांक: 24 जून 2025
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने नाबालिग अपराधियों के अधिकारों की रक्षा करते हुए एक ऐतिहासिक निर्णय में उम्र 17 वर्ष के एक किशोर को दी गई उम्रकैद की सजा को अवैध करार दिया है। यह फैसला न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल की खंडपीठ ने सुनाया।
📌 प्रकरण का संक्षिप्त विवरण:
कोरबा जिले में दर्ज एक मामले में 17 वर्षीय किशोर पर भारतीय दंड संहिता की धारा 307 (हत्या का प्रयास) के तहत आरोप लगाया गया था। 27 सितंबर 2017 को जिला एवं सत्र न्यायालय द्वारा उसे वयस्क मानते हुए आजीवन कारावास और ₹2,000 जुर्माने की सजा सुनाई गई थी।
⚖️ हाईकोर्ट में उठाए गए प्रमुख मुद्दे:
नाबालिग को Juvenile Justice Board (JJB) में प्रस्तुत करने के बाद, JJB ने केवल एक प्रारंभिक रिपोर्ट तैयार की और मामले को सीधे Children's Court को ट्रांसफर कर दिया।
किशोर को अपनी बात रखने का उचित अवसर नहीं मिला और ना ही जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता रखी गई।
अभियोजन पक्ष ने किशोर को “heinous offence” (अत्यंत गंभीर अपराध) के अंतर्गत प्रस्तुत किया, जबकि धारा 307 के तहत न्यूनतम सजा 7 वर्ष से कम भी दी जा सकती है – अतः यह अपराध “serious” श्रेणी में आता है, “heinous” नहीं।
📚 कानूनी दृष्टिकोण:
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि:
Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015 की धारा 21 के तहत नाबालिग को उम्रकैद या मृत्युदंड नहीं दिया जा सकता।
धारा 307 IPC को heinous crime नहीं माना जा सकता क्योंकि इसमें न्यूनतम सजा निर्धारित नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के Shilpa Mittal बनाम भारत सरकार (2020) मामले में भी यही निर्णय दिया गया था कि 7 वर्ष से कम अनिवार्य सजा वाले अपराधों को heinous नहीं कहा जा सकता।
🧾 कोर्ट का अंतिम आदेश:
किशोर को दी गई आजीवन कारावास की सजा को रद्द किया गया।
न्यायालय ने कहा कि JJB द्वारा पूरी प्रक्रिया अपनाए बिना सजा देना प्रक्रिया के विपरीत था।
🔍 निर्णय का महत्व:
यह फैसला स्पष्ट करता है कि:
किसी नाबालिग को वयस्क मानकर गंभीर दंड देना तभी संभव है जब प्रक्रिया पूरी तरह से न्यायोचित हो।
JJB को प्रारंभिक मूल्यांकन के दौरान नाबालिग को सुनवाई का अधिकार देना अनिवार्य है।
न्यायिक व्यवस्था में नाबालिगों को विशेष सुरक्षा और संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है।
📝 निष्कर्ष:
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह निर्णय देशभर की अदालतों के लिए एक मापदंड (precedent) स्थापित करता है, जो नाबालिगों के न्यायपूर्ण व्यवहार, विधिक प्रक्रिया और मानवाधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करता है। यह आदेश न्यायिक दक्षता और संविधान सम्मत प्रक्रिया का मजबूत उदाहरण है।
स्रोत: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय आदेश, Shilpa Mittal बनाम भारत सरकार (SC Judgment, 2020), Juvenile Justice Act, 2015
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