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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा से बाहर : PM मोदी और RSS पर आपत्तिजनक कार्टून बनाने वाले कार्टूनिस्ट हेमंत मालवीय पर कोर्ट की सख्ती — अग्रिम जमानत याचिका खारिज

Ashwani Kumar Sinha

Tue, Jul 8, 2025

📰 कानूनी समाचार रिपोर्ट — कार्टूनिस्ट हेमंत मालवीय पर आरएसएस व प्रधानमंत्री पर आपत्तिजनक कार्टून बनाने का मामला


📌 शीर्षक:

PM मोदी और RSS पर आपत्तिजनक कार्टून बनाने वाले कार्टूनिस्ट हेमंत मालवीय पर कोर्ट की सख्ती — अग्रिम जमानत याचिका खारिज


🗓 घटना का विवरण:

इंदौर (मध्यप्रदेश) निवासी कार्टूनिस्ट हेमंत मालवीय पर मई 2025 में एक विवादास्पद कार्टून सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के कारण लसूड़िया थाना, इंदौर में FIR दर्ज की गई।
कार्टून में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भगवान शिव का उल्लेख अपमानजनक और धार्मिक भावनाएं आहत करने वाले रूप में किया गया था।


⚖️ दर्ज धाराएं:

FIR में आरोपी पर निम्नलिखित धाराएं लगाई गईं:

  • भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा:

    • 153‑A (धर्म के आधार पर द्वेष फैलाना)

    • 295‑A (धार्मिक भावनाओं का अपमान)

    • 505 (सार्वजनिक शांति भंग करना)

  • IT अधिनियम, 2000 की धारा:

    • 67‑A (आपत्तिजनक सामग्री का इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से प्रकाशन)


🏛 हाईकोर्ट की सुनवाई – दिनांक 3 जुलाई 2025:

  • याचिकाकर्ता (हेमंत मालवीय) ने मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में अग्रिम जमानत याचिका दाखिल की थी।

  • न्यायमूर्ति सुभोध अभ्यंकर की एकलपीठ ने यह याचिका खारिज कर दी।

कोर्ट की मुख्य टिप्पणियाँ:

"यह कार्टून न केवल मर्यादाओं का उल्लंघन है बल्कि सामाजिक वैमनस्य फैलाने का प्रयास भी है।"
"आरोपी को कानून की सीमाओं का ज्ञान नहीं है। यह केवल आलोचना नहीं बल्कि असभ्य व्यंग्य है।"


👨‍⚖️ कोर्ट का निष्कर्ष:

  • आरोपी का कृत्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा से बाहर पाया गया।

  • अदालत ने कहा कि यह स्पष्ट रूप से धार्मिक व सामाजिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का प्रयास है।

  • कोर्ट ने कस्टोडियल पूछताछ (पुलिस हिरासत) की आवश्यकता बताते हुए अग्रिम जमानत खारिज कर दी।


🧭 संविधानिक पक्ष:

  • अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" की गारंटी है, लेकिन यह पूर्ण नहीं है।

  • अनुच्छेद 19(2) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता और नैतिकता के आधार पर इस अधिकार पर प्रतिबंध संभव है।


🔍 निष्कर्ष:

यह मामला "व्यंग्य और असभ्य आक्षेप" के बीच के अंतर को रेखांकित करता है।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि "स्वतंत्रता का अर्थ निरंकुशता नहीं है", और राजनीतिक/धार्मिक चरित्रों पर अभद्र टिप्पणियों को सहन नहीं किया जायेगा।

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