: मधुर वचन और पांच प्रकार के व्यर्थ बोल
Admin
Thu, Aug 31, 2023
कहा जाता है कि किसी व्यक्ति के मन में कौन से विचार चल रहे हैं, इसके लिए सही दर्पण होता है उस व्यक्ति के बोल । यदि मन के विचार शुभ भावना और शुभकामनाएं वाले हैं तो बोल भी शक्तिशाली शुद्ध और कल्याणकारी होंगे । जैसे हाथों से श्रेष्ठ कर्म करने से हमारा दुआओं का और पुण्य का खाता जमा होता है, इसी प्रकार से सुखदाई बोल बोलने से भी दुआओं का और पुण्य का खाता जमा होता है। चाहे हम आपस में बातचीत करें या कारोबार के लिए बोले लेकिन बोल को लंबा ना करें क्योंकि जितना कम बोलेंगे उतनी शक्ति जमा होगी।
व्यर्थ बोल, मोटे तौर पर पांच प्रकार के होते हैं, 1. सीमा से बाहर हंसी मजाक करना 2.ताना मारने के तरीके से बात करना 3.इधर-उधर के समाचार इकट्ठे करके सुनना और सुनाना 4.ईश्वरी सेवा के समाचार सुनाते हुए भी सेवाधारीयो की कमजोरी का चिंतन करना 5.ऐसे बोल जो युक्ति युक्त नहीं है अर्थात जो सभ्यता के दायरे से बाहर है। हसीं मजाक केवल वही अच्छा है जिसमें रूहानियत हो और जिससे हंसी मजाक किया जाए उसे आत्मा को फायदा हो, समय सफल हो लेकिन हमने अगर ऐसा हंसी मजाक किया कि किसी को कोई शब्द चुभ गया कोई नाराज हो गया और इतना नाराज हुआ कि उसके मन में बदले की भावना जाग गई तो वास्तव में हमारा समय व्यर्थ ही चला गया। व्यर्थ बोलने वाला व्यक्ति अपनी बुद्धि में व्यर्थ बातों और व्यर्थ समाचारों का कूड़ा कचरा इकट्ठा करेगा, क्योंकि उसको अपनी कथा को रमणीक रूप देना है, जैसे कई कथाकार होते हैं, कथा को इतना लंबा चौड़ा बनाकर सुनते हैं की मनोरंजन तो थोड़ा बहुत होता है, लेकिन उसमें सार कुछ भी नहीं होता, इसलिए भगवान कहते हैं जिस समय और जिस स्थान पर जो बोल जरूरी है युक्ति युक्त है अपने और दूसरों दूसरी आत्माओं के लिए लाभदायक है वही बोलो । वाणी की बचत की स्कीम बनाओ, जैसे गवर्नमेंट भिन्न-भिन्न विधि से बचत की स्कीम बनती है, ऐसे ही आप भी अपनी वाणी की बचत की स्कीम बनाओ। नम्र व्यक्ति के लिए हर एक मन से दुआएं निकलती है, दुआएं पुरुषार्थ में लिफ्ट से भी रॉकेट बन जाती है, कोई कितना भी व्यस्त हो, कठोर दिल हो, क्रोधी हो, लेकिन नम्रता सबका सहयोग दिलाने की निमित बन जाती है। मधुर बोल हैं सबसे अच्छा मीठा प्रसाद, प्रसाद से मुख मीठा थोड़े समय के लिए होता है, लेकिन अगर हम खुद ही मीठे बन जाए तो सदा मिठास का अनुभव करते रहेंगे । जैसे मीठा खाने और खिलाने से खुशी होती है, ऐसे ही मधुर बोल खुद को भी खुश करते हैं और दूसरों को भी खुश करते हैं यही है सबसे अच्छा मीठा प्रसाद। हम यदि सामने वाले व्यक्ति को उसकी उच्चता, महानता और श्रेष्ठता का बोध कराए तो वह हर बात में हमारा सहयोगी बन सकता है। मुख का मौन अर्थात वाणी का संयम, 50 शब्दों की बात पांच शब्दों में बोल देना यह मुख का मौन है। आंखों का संयम, जिस ओर हमारी दृष्टि जाती है उस ओर हमारी शक्ति प्रवाहित होती है, परदर्शन परचिंतन पतन की जड़ है, अतः परदर्शन से आंखों का संयम रखें, जो परचिंतन से भी बचा लेगा । कानों का संयम, जैसे यूनान का सुकरात, जब कोई उसे कुछ बताने आता था तो वह कहता था, रुको, पहले बताओ कि क्या यह बात सत्य है ? क्या यह बात मेरे काम की है ? क्या यह बात सकारात्मक है ? और यदि इनमें से किसी भी प्रश्न का उत्तर "ना" होता, तो वह बात सुनने से मना कर देता था। पैरों का संयम, चले तो हलके कदमों से की आवाज ना हो जैसे कोई फरिश्ता आहिस्ते से गुजर रहा हो । जीभ का संयम, जीभ का विराम पेट की फैक्ट्री को अवकाश देकर, अंतडियो की सफाई और स्वास्थ्य की बधाई दिलाता है, अर्थात उपवास सबसे बड़ी औषधि है । मन का मौन, जब हम आंखों, कानों, और मुख का मौन रखते हैं तो मन का मौन रखना आसान हो जाता है, मनमनाभव ही मन का मौन है।विज्ञापन