: जीवन एक अनंत यात्रा....
Admin
Wed, Aug 30, 2023
जीवन एक अनंत यात्रा है । कहने को तो हम कह देते हैं कि कोई मानव पैदा हुआ या कोई मानव मर गया लेकिन वास्तविकता यह है कि ना कोई मरता है, ना कोई जन्मता है बल्कि यह पांच तत्व का शरीर अपनी अवस्थाएं बदलता है । पहले जन्म, फिर शैशव अवस्था, बाल्यावस्था, युवावस्था, वृद्धावस्था तथा अंत में मृत्यु की व्यवस्था है, इसके बाद आत्मा फिर गर्भ में आती है और पुनः वही चक्र शुरू हो जाता है । शरीर को धारण करने वाली आत्मा ना जन्मती है, न मरती है, आत्मा ही यात्री है जो शरीर द्वारा यात्रा करती है।
गर्भावस्था में आत्मा, अपने पिछले जन्मों के कर्मानुसार शरीर बुनती है । वैसे ही उसके अंग प्रत्यंग बनते हैं, इसके बाद बच्चा जन्म लेता है, तो यह अवस्था फूल की तरह कोमल होती है और सबको प्यारी लगती है । युवावस्था में बुरे तथा अच्छे का विवेचन किया जा सकता है । चाहे तो वह सत्कर्म करके सच्चा आत्मिक सुख प्राप्त कर सकता है, चाहे तो कुसंगति में पड़कर, विकर्म करके जीवन को धूमिल वह दुखी बना सकता है। हर अवस्था में मानव कर्म करने में पूर्णतया स्वतंत्र होता है तथा कर्म करने के बाद फल भोगने के लिए बाधित हो जाता है।
जब आयु 60 वर्ष के करीब पहुंच जाती है तो बुढ़ापा दस्तक देता है, तब सभी इंद्रियां शिथिल होने लगती है, इंसान पर वश सा हो जाता है। जियो जियो और आयु बढ़ती जाती है त्यों त्यों मानव मृत्यु के नजदीक पहुंचता जाता है। आखिर एक दिन शरीर बिल्कुल जवाब दे जाता है। इसी को ही मृत्यु की अवस्था कह देते हैं, तब आत्मा शरीर से निकल जाती है।
मृत्यु के निकट पहुंची आत्मा को, जो भी जीवन काल में अच्छे व बुरे कर्म किए हुए होते हैं, वह याद आने लगते हैं और उसे कुछ पश्चाताप भी होने लगता है लेकिन वह मजबूर होती है तथा किए हुए कर्मों अनुसार जहां अपना कर्म भोग चुकता करना होता है, वही जाकर फिर से गर्भ में प्रवेश कर जाती है। फिर वही जीवन चक्र शुरू हो जाता है इस प्रकार मानव जीवन कभी समाप्त नहीं होता है और ना कभी रुकता है, लगातार चलता ही रहता है।
हम सिर्फ इतना ही कर सकते हैं कि समस्त जीवन काल में हम ऐसे कम करें कि उनका फल हमें दुख के रूप में ना भोगना पड़े। जो भी कर्म हम करते हैं, चाहे अज्ञानता बस, चाहे काम क्रोध, आदि विकारों के वश या किसी के प्रलोभन के वश, अंततः उसका फल इसी जन्म में चाहे अगले किसी भी जन्म में हमें भोगना ही पड़ेगा। जिस प्रकार एक व्यक्ति एक ट्रेन से उतरकर गंतव्य स्थान पर पहुंचने के लिए दूसरी ट्रेन पकड़ता है, तो अपना सामान तो साथ लेकर ही जाता है, इसी प्रकार कर्म फल ही हमारा सामान है या हमारा बैग सूटकेस है, तो सदा ध्यान रहे कि हम अपने बैग सूटकेस में क्या भरा रहे हैं, यदि केवल अच्छे कर्म ही भरेंगे तभी भविष्य जीवन यात्रा, सदा सुखमय, शांतिमय, आनंदमय रह सकती है।
अनेक बार आत्मा ने शरीर लिए और छोड़ें, कितने पुण्य और पाप कर्म किए, कितने महल बनाए, कितना धन इकट्ठा किया तथा और भी क्या कुछ नहीं किया लेकिन साथ कुछ नहीं रहा यदि रहा तो केवल कर्म फल ही साथ रहा, इसलिए हमें बाकी स्थूल पदार्थों की ओर ध्यान न देकर, केवल कर्मों की स्वच्छता पर ही ध्यान देना चाहिए, यही मानव जीवन की सफलता है।
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