: चुनौती स्वीकारे
Admin
Wed, Sep 13, 2023
जीवन के हर कदम पर जो चैलेंज आएगा उसको हमें स्वीकार करना है। हम हमेशा कंफर्ट जोन में सुरक्षित रहना चाहते हैं। उसमें से बाहर निकलना नहीं चाहते। हमें अपनी हानि होने का डर लगता है। अगर मेरा कोई नुकसान हो गया तो क्या करेंगे। ऐसे विचारों से हम चैलेंज लेना छोड़ देते हैं। दूसरी बात है डाउट। हमारे मन में यह आशंका रहती है कि क्या मैं यह सब कुछ कर सकूंगा ? क्या सब कुछ सफल होगा ? मेरी हार हो जाए तो क्या। ऐसी शंकाए मन में आने से हम चैलेंज नहीं लेते।
कल्पना चावला और सुनीता विलयम हमारे जमाने की ही वीरांगना है। जिन्होंने अंतरिक्ष यात्रा का चैलेंज लिया। वैसे हमें भी अपने जीवन में चैलेंज लेकर आगे बढ़ाना है।
सावित्रीबाई फुले जिन्होंने उसे समय महिलाओं को शिक्षा देने का चैलेंज स्वीकार इसलिए आज महिलाएं यहां पढ़ रही हैं और जीवन में आगे बढ़ रही हैं। तो आज हमें भी एक ऐसा चलेंगे स्वीकारना होगा जिसका लाभ आपको और इस दुनिया को भी होगा। तो कितना चैलेंज हम स्वीकारेंगे। आगे देखेंगे हमें कितना चैलेंज स्वीकारना है।
रविंद्र नाथ टैगोर की एक कविता में बताया है जब पूरी दुनिया में अंधेरा हुआ है तो इस दुनिया को प्रकाश कौन देगा ? तभी ट्यूबलाइट कहती है, "मैं तो इतना प्रकाश नहीं दे सकती"। बल्ब कहता है, "मुझसे भी इतना प्रकाश देना नहीं होगा"। लालटेन कहती है "मुझे भी इतना प्रकाश देना नहीं होगा"! मोमबत्ती कहती है, "यह मेरा भी काम नहीं है"! तब एक छोटा सा दीपक आगे आता है और कहता है, "मैं दूंगा इस दुनिया को प्रकाश, "जितना मुझसे होता है उतना"! तो हमें भी जितना होता है उतना चैलेंज जरूर स्वीकारना है । चैलेंज ही हमें कुछ बनाता है, सिखाता है, और आगे बढ़ता है। चैलेंज वहीं लेता है जिसे समय का महत्व पता है क्योंकि समय किसी के लिए रुकता नहीं वह तो चलता ही रहता है।
विज्ञापन