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ऋतु के अनुसार आहार-विहार अपनाना ही स्वस्थ जीवन का आधार है : आषाढ़ मास में अपनाएं आयुर्वेदिक ऋतुचर्या, वर्षा ऋतु में रहें स्वस्थ – आयुष विशेषज्ञों की सलाह

Ashwani Kumar Sinha

Wed, Jul 1, 2026

आषाढ़ मास में अपनाएं आयुर्वेदिक ऋतुचर्या, वर्षा ऋतु में रहें स्वस्थ – आयुष विशेषज्ञों की सलाह

भोपाल। आषाढ़ मास वर्षा ऋतु का प्रारंभ और ऋतु परिवर्तन का संधिकाल माना जाता है। आयुर्वेद के अनुसार इस समय शरीर की जठराग्नि (पाचन शक्ति) अपेक्षाकृत कमजोर हो जाती है तथा दूषित जल, आर्द्रता और बदलते मौसम के कारण संक्रमण एवं पाचन संबंधी रोगों का जोखिम बढ़ जाता है। इसलिए इस अवधि में खान-पान और दिनचर्या में विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है।

आयुष मंत्रालय द्वारा प्रचारित आयुर्वेद की ऋतुचर्या तथा प्राकृतिक चिकित्सा के विशेषज्ञों के अनुसार वर्षा ऋतु में ताज़ा, हल्का, गर्म और सुपाच्य भोजन करना स्वास्थ्य के लिए सबसे उपयुक्त माना गया है। मूंग की दाल, खिचड़ी, दलिया, पुराना चावल, गेहूं, जौ, लौकी, तोरई, परवल और कद्दू जैसी सब्जियां पाचन पर कम भार डालती हैं तथा शरीर को आवश्यक पोषण प्रदान करती हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि वर्षा ऋतु में उबालकर या शुद्ध किया हुआ पानी पीना सबसे सुरक्षित उपाय है। बासी भोजन, अत्यधिक तला-भुना, मसालेदार, अधिक तेलयुक्त भोजन, खुले में बिकने वाले खाद्य पदार्थ तथा दूषित पानी से यथासंभव बचना चाहिए, क्योंकि इससे दस्त, गैस, अपच, फूड पॉइजनिंग और अन्य जलजनित रोगों की संभावना बढ़ सकती है।

आयुर्वेद में जीरा, धनिया, हल्दी, सौंठ, हींग, काली मिर्च, मेथी, दालचीनी, पुदीना और हरा धनिया जैसे मसालों का संतुलित उपयोग पाचन क्रिया को सहयोग देने वाला माना गया है। वहीं प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञ मौसमी एवं ताज़े फलों का सीमित मात्रा में सेवन, स्वच्छ भोजन और संतुलित आहार को प्राथमिकता देने की सलाह देते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार केवल भोजन ही नहीं, बल्कि जीवनशैली भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। प्रतिदिन प्रातः जल्दी उठना, योग, प्राणायाम, ध्यान, नियमित भ्रमण (वॉक), हल्का व्यायाम तथा पर्याप्त नींद शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में सहायक होते हैं। वहीं दिन में अधिक देर तक सोना, रात में देर तक जागना, आलस्यपूर्ण जीवनशैली और अनियमित भोजन से बचना चाहिए।

आयुर्वेद में वर्षा ऋतु के दौरान संयमित भोजन (मिताहार) पर विशेष बल दिया गया है। आवश्यकता से अधिक भोजन करने के बजाय भूख के अनुसार भोजन करना तथा भोजन के बीच पर्याप्त अंतर रखना पाचन तंत्र के लिए लाभकारी माना गया है।

ऐसा करने से मिल सकते हैं ये लाभ:

पाचन शक्ति बेहतर बनी रहती है।

गैस, अपच और पेट संबंधी समस्याओं का जोखिम कम होता है।

जलजनित एवं मौसमी संक्रमणों से बचाव में सहायता मिलती है।

रोग प्रतिरोधक क्षमता को समर्थन मिलता है।²

शरीर में ऊर्जा, स्फूर्ति और कार्यक्षमता बनी रहती है।

वर्षा ऋतु में संपूर्ण स्वास्थ्य बेहतर बनाए रखने में मदद मिलती है।

आयुष विशेषज्ञों का संदेश है कि "ऋतु के अनुसार आहार-विहार अपनाना ही स्वस्थ जीवन का आधार है।" यदि किसी व्यक्ति को मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय, किडनी या अन्य गंभीर बीमारी है, तो आहार में बड़े बदलाव करने से पहले अपने चिकित्सक या आयुर्वेद विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लेना चाहिए।

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