: कोई भी पिता अपने बच्चे को यह नहीं कह सकता की मुझे प्रशन्न करने के लिए तुम भोजन का उपवास रखो..
Thu, Jul 25, 2024
मैं भगवान को प्रशन्न करने के लिए कभी भोजन का उपवास नहीं करता मैं श्रीमत पर चलकर भगवान को प्रशन्न करता हूं.... मैं अपनी एक एक बुराइयों से लड़कर उस पर जीत हांसिल करके भगवान को प्रशन्न करता हूं......
जो मनमत पर चलते हैं वह भोजन का उपवास रखकर भगवान को प्रशन्न करने की कोशिश करते हैं जैसे छोटा बच्चा जो बहुत बदमाशी करता हो परिजन की आज्ञा का पालन ना करता हो उससे उसके माता पिता खुश नहीं होते और ज़ब उसे अपनी कोई बात अपने माता पिता से मनवानी होती है वह अपनी बात मनवाने के लिए मां बाप के सामने अनेको तरह से जिद करता है कभी रोता है तो कभी भूखा रहकर परिजन को इमोशनल ब्लेकमेल करता है या जमीन पर लोटता है या अपने को किसी तरह से नुकसान पहुंचाता है जिससे की उससे जो मोहग्रस्त माता पिता हैं वह मजबूर होकर उसका कहा मान ले ठीक उसी तरह आज लोग भी करने लगे हैं ज़ब उनकी मनोकामना पूर्ति नहीं होती तो भगवान को रिझाने के लिए तरह तरह के जिद वाले कार्य करते हैं पर जो व्यक्ति श्रीमत पर चलता है उसे कभी अलग से भगवान को रिझाने की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि उसके विचार वाणी कर्म श्रीमत प्रमाण होने से भगवान स्वतः ही उससे खुश हो जाते हैं
भगवान को प्रशन्न करने का एक मात्र उपाय है ईश्वरीय मर्यादाओं का पालन करना ... कोई भी पिता अपने बच्चे को यह नहीं कह सकता की मुझे प्रशन्न करने के लिए तुम भोजन का उपवास रखो...पर हर पिता तब प्रशन्न होता है ज़ब उसके बच्चे उनकी आज्ञा का पालन करते हैं ठीक उसी तरह ईश्वरीय श्रीमत भगवान की आज्ञा है ज़ब हम उसका पालन करते हैं तो इससे भगवान खुश होते हैं.....रही बात उपवास की तो अगर उपवास रखना ही है तो बुराइयों का उपवास रखना चाहिए क्योंकि बुराइयों का उपवास रखने से हमें डायरेक्ट लाभ होता है....
जैसे किसी मे चुगली करने की आदत है तो आजीवन चुगली करने की आदत से उपवास अगर किसी को नशे की या चोरी की या रिश्वत लेने की आदत है तो उन बुराइयों का उपवास इस तरह से उपवास रखना बड़ा फायदेमंद होता है.....भोजन का उपवास यह सोचकर रखना की भोजन के उपवास रखने से भगवान प्रशन्न होंगे तो यह अज्ञानता है हाँ वैज्ञानिक दृश्टिकोण से उपवास के अनेक फायदे जरूर हैं अगर उन फायदों को ध्यान मे रखकर उपवास रखा रहे हैं तो यह बहुत अच्छी बात है मगर अगर उपवास यह सोचकर रख रहे हैं की उपवास रखने से भगवान खुश होंगे तो यह अज्ञानता है भगवान भोजन का उपवास रखने से नहीं भगवान तो बुराइयों का उपवास रखने से प्रशन्न होते हैं....
हमारी बुद्धि एक पात्र के समान है उस पात्र को पहले सदगुणो को रखने के योग्य बनाना पड़ता है दुनियां भर के बुरे संस्कारों का कचरा मन बुद्धि मे रखकर भगवान की कृपा पाने के लिए भोजन का उपवास रखना यह अज्ञानता नहीं तो क्या है अगर किसी कार्यों मे सफलता चाहिए तो उस कार्यों को उस विधि से करने की जरूरत है जिस विधि से करने से वह कार्य सफल होंगे इसके साथ उस कार्य को सफल बनाने के लिए हमारे आंतरिक गुण व शक्ति भी लगते हैं अगर सही आंतरिक गुण व शक्ति लग गई तो सफलता निश्चित है अगर गलत गुण व शक्ति लगी तो असफलता निश्चित है अगर कार्यों को सिद्ध करने के लिए जरुरी गुण व शक्ति हममे नहीं तो हमें उन गुणों को उन शक्तियों को जागृत करने का उपाय तलासना होगा जो रास्ता अध्यात्म है अध्यात्म माना स्वयं का अध्ययन।
: सांस रोककर भगवान को याद करने से अपवित्र विचार रुक जाते हैं
Wed, Jun 5, 2024
प्रेम और अपवित्र विचार
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साँस रोक कर भगवान को याद करने से अपवित्र विचार रुक जाते हैं ।
-ऐसे ही कोई भी अन्य नाकारात्मक वृति जैसे क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या या आलस्य आदि मन में उठने लगे तो तुरंत साँस रोक कर भगवान को याद करो तो वह वृत्ति ख़त्म हो जायेगी ।
-अपवित्र विचारों को ख़त्म करने की दूसरी विधि यह है कि जब भी आप किसी से मिलें , लिंग या पुलिंग, तो उसके माथे पर देखो । उस से आई कॉंटेक्ट नही करना । अगर हम किसी दूसरे से 20 सेकेंड से ज्यादा आई कॉंनटेक्ट करते हैं तो आप का उस पर प्रभाव पड़ रहा होता है या उस का प्रभाव तुम्हारे पर पड़ रहा होता है ।
-माथा आत्मा का अकाल तख्त है । माथे को न सर्दी लगती है न गर्मी लगती है ।
-माथे पर देखने से आकर्षण नही होता । आँखो से ऊपर लगभग दो इंच ऊँचाई पर माथे के बीचो बीच देखो । इस तरह देखने से सामने वाले को यह भी नही लगेगा कि आप उसको इग्नोर कर रहे है तथ आकर्षण भी नही होगा । माथे पर देखने से यह नही लगता कि यह मेल का माथा देख रहे है या फीमेल का ।
-अगर किसी व्यक्ति को आप मन में याद करते हैं या याद आता है तो भी मन से उसके माथे पर ही देखो । इस वे की अपवित्र विचार का खिंचाव नही होगा शरीर के किसी दूसरे हिस्से पर स्थूल में या सूक्ष्म में देखने से विचार अपवित्र हो सकते है ।
-अपवित्रता का कनेक्शन जीभ से भी है ।
-अगर आप का जीभ पर कंट्रोल नही है । आप की जीभ तरह तरह के व्यंजनों के पीछे लपकती है तो मन में अपवित्र संकल्प कभी रुकेगे नही ।
-अगर आप तेज गति से खाना खाते है अर्थात.खाना निगलते है तो अपवित्र संकल्प रुकेंगे नही । अगर आप खाना प्यार से खाते हैं और चबा चबा कर खाते हैं तो आप का संकल्पों पर नियंत्रण रहेगा ।
-अगर आप तीखा बोलते हैं । बोलते ही जाते हैं । बहुत जल्दी क्रोधित हो जाते हैं तो अपवित्र विचार आप को उसी गति से डिस्ट्रब करेंगे ।
-अगर आपकी जबान बजार की चीजे खाने को लपकती हैं तो समझो अपवित्र विचार आप को वैसे ही स्तायेगें ।
-अगर आप मन से भी अपवित्रता को जीतना चाहते है तो पहले जीभ के स्वाद को जीतों ।
-जीवन को नई दिशा दे,,,,,,
: परमात्मा के प्रति डर को जाने
Sun, Apr 7, 2024
आन्तरिक बल
परमात्मा के प्रति डर पैदा कर दिया गया है ! अगर प्रसाद नहीं लिया तो ईश्वर नाराज हो जाएगा ! शुक्रवार को व्रत रखा तो खट्टा न खाएं, शनिवार को बाल न कटवाएं, किसी विशेष दिन पर तेल न ख़रीदे, नही तो ईश्वर नाराज हो जाएगा ! सच यह है कि भगवान प्यार का सागर है ! भगवान हमें सदा प्यार ही करता है !
गर्मी के मास में हम चाय ही चाय पीते रहें तो एसिडिटी बढ़ जाएगी ! सर्दी में हम शरबत पीते रहें तो शरीर जकड़ जाएगा ! मौसम की प्रकृति अनुसार जो आप को सूट करता है वह चीजे खाएं ताकि आप को शारीरिक बल मिलता रहे ! भगवान को याद करते रहें ! आप का मनोबल बना रहेगा !
परमात्मा से तो हमारा सम्बन्ध प्रेम हा है, डर का नहीं !
प्रार्थना तो प्रेम का सहज परिणाम है ! प्रार्थना करनी नही पड़ती, सहज निकलती है !
प्रार्थना के लिए किसी मंदिर-मस्जिद की आवश्कयता नहीं पड़ती, जहां भी हम प्रार्थनामय हुए मंदिर भी वहीं, मस्जिद भी वहीं है ! प्रार्थना के लिए किसी हवन कुंड या यज्ञ के सामग्री की आवश्कयता नहीं !
जिस क्षण भी हम प्रार्थनामय हुए, उसी क्षण हमारे भीतर हवन-अग्नि जली और उस अग्नि में सामग्री नहीं, हमारा अहंकार जलेगा !
प्रार्थना तो निशब्द पुकार है ! भाव है ह्रदय का ! प्रभु के प्रति प्यास ! धन्यवाद का भाव है !
-जीवन को नई दिशा दे............