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: फेफड़ा के कार्य और नेचुरल उपचार

Admin

Sun, Jun 2, 2024
फेफड़ा प्रत्येक प्राणी, जो वायु में श्वांस लेते हैं, उनके शरीर का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है, 'फेफड़ा' या 'फुप्फुस'। फेफड़े को वैज्ञानिक या चिकित्सीय भाषा में फुफ्फुस कहा जाता है। यह प्राणियों में एक जोडे़ के रूप मे उपस्थित होता है। फेफड़े की दीवार असंख्य गुहिकाओं की उपस्थिति के कारण स्पंजी होती है। फेफड़े में ही रक्त का शुद्धीकरण होता है। रक्त में प्राय: जीवनदायिनी ऑक्सीजन का मिश्रण होता है। फेफड़ों का मुख्य कार्य वातावरण से ऑक्सीजन लेकर उसे रक्त परिसंचरण मे प्रवाहित करना और रक्त से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर उसे वातावरण में छोड़ना है। गैसों का यह विनिमय असंख्य छोटी-छोटी पतली-दीवारों वाली वायु पुटिकाओं, जिन्हें 'अल्वियोली' कहा जाता है, में होता है। यह शुद्ध रक्त पल्मोनरी धमनी द्वारा हृदय में पहुँचता है, जहाँ से यह फिर से शरीर के विभिन्न अवयवों मे पहुँचाया किया जाता है। फेफड़ों की संरचना.... फेफड़ों की आन्तरिक संरचना मधुमक्खी के छत्ते के समान स्पंजी, असंख्य वायुकोषों में बँटी रहती है। वायुकोषों की संख्या वयस्क व्यक्ति में लगभग पन्द्रह करोड़ होती है। प्रत्येक वायुकोश का सम्बन्ध श्वसनी से होता है। प्रत्येक श्वसनी जो श्वासनली के दो भागों में विभक्त होने से बनती है, फेफड़े के अन्दर अनेकों शाखाओं तथा उपशाखाओं में विभक्त होती है। इसकी अन्तिम महीन उपशाखाएँ कूपिका नलिकाएँ कहलाती हैं। प्रत्येक कूपिका नलिका के सिरे पर अंगूर के गुच्छे की तरह अनेक वायुकोश जुड़े रहते हैं। प्रत्येक वायुकोश अति महीन झिल्ली का बना होता है। इसकी निर्माणकारी कोशिकाएँ चपटी होती हैं। इसकी बाह्य सतह पर रुधिर कोशिकाओं का जाल फैला रहता है। इस जाल का निर्माण पल्मोनरी धमनी के अत्यधिक शाखान्वयन से होता है। इससे कार्बन डाइऑक्साइड युक्त रक्त फेफड़ों में आता है। कार्बन डाइऑक्साइड में वायुकोश में विसरित हो जाती है तथा ऑक्सीजन रक्त में मिल जाती है। श्वासोच्छ्वास या श्वास क्रिया..... वायुमण्डल की शुद्ध (ऑक्सीजन युक्त) वायु फेफड़ों में पहुँचने तथा अशुद्ध वायु के फेफड़ों से बाहर निकलने की क्रिया को 'श्वासोच्छ्वास' क्रिया या साँस लेना कहते हैं। मनुष्य 12 से 15 बार प्रति मिनट की दर से बाहरी वायु को फेफड़ों में बार–बार भरता और निकालता है। यक एक यान्त्रिक क्रिया होती है। इसके दो चरण होते हैं अन्तःश्वसन या निश्वसन या प्रश्वसन इस प्रक्रम में फेफड़े फूलते हैं, जिनसे इनमें वायु का दबाव बाहरी वायु की दबाव की अपेक्षा कुछ कम हो जाता है और बाहरी वायु इनमें खिंच जाती है अर्थात् भर जाती है। निःश्वसन या उच्छ्वास या निःश्वसन अथवा उच्छ्वसन इस प्रक्रम में फूले हुए फेफड़े पिचककर सामान्य स्थिति में आ जाते हैं, जिससे इनमें वायु का दबाव बाहरी वायु के दबाव से कुछ अधिक हो जाता है और इनमें भरी वायु बाहर निकल जाती है। इस प्रकार फेफड़े चूषक पम्पों या धौंकनी के समान कार्य करते हैं। फेफड़ों के रोगों से बचाव हेतु घरेलू खान पान आहार विहार विभिन्न औषधियों से उपचार..... मुनक्का मुनक्का के ताजे और साफ 15 दाने को रात में 150 मिलीलीटर पानी में भिगों दे। सुबह इसके बीज निकालकर फेंक दें और गूदा एक-एक करके खूब चबा-चबाकर खाएं। बचे हुए पानी में थोड़ी सी चीनी मिलाकर या बिना चीनी मिलाएं ही पी लें। 1 महीनें तक मुनक्का का सेवन करने से फेफड़ों की कमजोरी और विषैले मवाद नष्ट हो जाते हैं। इसके फलस्वरूप दमा के दौरे भी बन्द होते हैं। इससे पुरानी खांसी, नजला और पेट की खराबियां दूर होती है। कब्ज, बवासीर, नकसीर तथा मुंह के छालों के लिए भी यह बहुत लाभकारी है। इसके सेवन से मूत्र खुलकर आता है तथा खून में लाल कणों की मात्रा बढ़ जाती है। खून शुद्ध होता है और खून, वीर्य व बल बढ़ता है। शहद शुद्ध शहद एक चम्मच की मात्रा में प्रतिदिन सेवन करने से व्यक्ति के फेफड़े मजबूत होते हैं। इसका 1-2 महीने उपयोग करना चाहिए। ध्यान रहें कि रोग के नष्ट होने के बाद केवल स्वाद के लिए बिना किसी आवश्यकता के शहद का सेवन न करें। गुण शहद के विशेष गुण होते हैं। अंगूर फेफड़ों के सभी प्रकार के रोग जैसे यक्ष्मा, खांसी, जुकाम और दमा आदि के लिए अंगूर का सेवन करना बहुत लाभकारी होता है।* अंजीर फेफड़ों के रोगों में 5 अंजीर को एक गिलास पानी में उबालकर पीना चाहिए। इसका सेवन प्रतिदिन सुबह-शाम करने से फेफड़ों का रोग नहीं होता। लहसुन लहसुन के प्रयोग से कफ नष्ट होता है। इसलिए खाना खाने के बाद या भोजन में लहसुन का सेवन करना चाहिए। (लहसुन की एक दो कली को दूध व पानी मिलाकर पकाकर निकाल ले दूध पी जाएं गाँठ को मिश्री के साथ खा ले फेफड़े मजबूत बने रहते हैं) पालक खांसी, गले की जलन व फेफड़ों में सूजन होने पर पालक के रस से कुल्ला करना चाहिए। दूध दूध में 5 पीपल व मिश्री मिलाकर गर्म करके प्रतिदिन सुबह-शाम पीने से खांसी तथा फेफड़ों की कमजोरी दूर होती है। तुलसी तुलसी के सूखे पत्ते, कत्था, कपूर और इलायची समान मात्रा में लेकर 9 गुना मिश्री मिलाकर बारीक पीस लेते हैं और यह चुटकी भर की मात्रा में लेकर प्रतिदिन सुबह-शाम सेवन करें। इससे फेफड़ों में जमा कफ नष्ट होकर निकल जाता है।* मुलहठी मुलहठी फेफड़ों की सूजन, गले में खराश, सूजन, सूखी कफ वाली खांसी में लाभ करती हैं। मुलहठी फेफड़ों को बल देती है अत: फेफड़ों सम्बंधी रोगों में लाभकारी हैं। इसको पान में डालकर खाने से लाभ होता हैं। टी.बी. (क्षय) रोग में भी इसका काढ़ा बनाकर उपयोग किया जाता है। गुलाब 1 कप गुलाब जल को चौथाई कप पानी के साथ दिन में 2-3 बार पीने से सीने में जलन तथा जी मिचलाना आदि रोग दूर हो जाते हैं। शहतूत के पत्ते शहतूत के पत्तों से लीवर, फेफड़ों के रोग, फेफड़ों की जलन जिससे ज्वर, सिरदर्द, कण्ठ दर्द, खांसी दूर होती है। आंखों में दर्द, ललाई, पानी आता हैं और खून की उल्टी आदि में लाभ होता है। अजवायन चौथाई चम्मच अजवायन को पानी मे उबालकर भाप लेने व चाय की तरहः पिने से फेफड़े के रोग नहीं होते हैं व नस्ट होते हैं। दालचिनी या लौंग :- दो तीन चुटकी दालचिनी या एक लौंग का चूर्ण शहद या गुड़ में मिलाकर लेने से फेफड़े व स्वास के रोग नहीं होते हैं व नस्ट होते हैं इसे उबालकर चाय की तरहः भी पी सकते हैं। गुड़ एक डली गुड़ का नियंमित सुबह शाम सेवन करने से पूरे दिन का प्रदूषण युक्त वातावरण के कारण उतप्पन विकार नस्ट होता है। विशेष.... गहरे श्वास की प्रक्रिया के फलस्वरूप फेफड़ों द्वारा रक्तकोष तथा मस्तिष्क का अधिकाधिक ऑक्सीजन मिलती है तथा अवांछित जलीय और गैसीय तत्वों को निष्कासन होता है। इससे सम्पूर्ण शरीर शुद्ध और तरोताजा हो आकर्षक हो जाता है। वर्तमान समय में आज लम्बी दौड़ के स्थान पर टहलने और खतरों भरे भारी व्यायाम की जगह हल्के व्यायाम का चलन बढ़ रहा है। भारतीय ऋषियों ने स्वास्थ्य को बनाये रखने के लिए सूर्योदय से पहले ब्रहममुहूर्त में उठने और सुबह के समय टहलने पर बहुत जोर दिया है। आजकल पैदल चलना छोड़कर अधिकाधिक वाहन निर्भरता ही हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप जैसे रोगों को प्रमुख कारण बन गया है। प्रतिदिन 3-4 किलोमीटर पैदल चलने वाले व्यक्तियों को दिल की बीमारी और डायबिटीज नहीं होती है। विकल्प टहलने के बाद गहरी सांस की प्रक्रिया : टहलने के बाद गहरी सांस की प्रक्रिया से फेफड़े रोग नहीं होते हैं बल्कि सदाबहारयौवन से युक्त रहते हैं। इसके लिए सुबह टहलते समय आपको केवल इस क्रिया का अहसास करना है कि जब श्वास भीतर लें तब श्वास सरलता पूर्वक नाक के अन्दर खींचे और जब श्वास छोड़े तब मुंह से लंबी फूंक मारते हुए बलपूर्वक आधिकाधिक श्वास बाहर निकाले। मुंह से बलपूर्वक अधिक लंबा सांस छोड़ने के बाद जब आप मुंह बन्दकर नाक श्वास से आसानीपूर्वक लेंगे तो श्वास स्वत: ही गहरी हो जाएगी!!! नोट, जानकारी में अगर किसी प्रकार का संशय लगने पर आप उपयोग से पूर्व अन्य स्रोतों से या राष्ट्रिय प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्र से सत्यापन जरूर करें।

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